Monday, 25 November 2024

एक पगली लड़की के बिन

अमावस की काली रातों में दिल का दरवाजा खुलता है,
जब दर्द की काली रातों में गम आंसू के संग घुलता है,
जब पिछवाड़े के कमरे में हम निपट अकेले होते हैं,
जब घड़ियाँ टिक-टिक चलती हैं,सब सोते हैं, हम रोते हैं,
जब बार-बार दोहराने से सारी यादें चुक जाती हैं,
जब ऊँच-नीच समझाने में माथे की नस दुःख जाती है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।

जब पोथे खाली होते है, जब हर्फ़ सवाली होते हैं,
जब गज़लें रास नही आती, अफ़साने गाली होते हैं,
जब बासी फीकी धूप समेटे दिन जल्दी ढल जता है,
जब सूरज का लश्कर छत से गलियों में देर से जाता है,
जब जल्दी घर जाने की इच्छा मन ही मन घुट जाती है,
जब कालेज से घर लाने वाली पहली बस छुट जाती है,
जब बेमन से खाना खाने पर माँ गुस्सा हो जाती है,
जब लाख मन करने पर भी पारो पढ़ने आ जाती है,
जब अपना हर मनचाहा काम कोई लाचारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।

जब कमरे में सन्नाटे की आवाज़ सुनाई देती है,
जब दर्पण में आंखों के नीचे झाई दिखाई देती है,
जब बड़की भाभी कहती हैं, कुछ सेहत का भी ध्यान करो,
क्या लिखते हो दिन भर, कुछ सपनों का भी सम्मान करो,
जब बाबा वाली बैठक में कुछ रिश्ते वाले आते हैं,
जब बाबा हमें बुलाते है,हम जाते में घबराते हैं,
जब साड़ी पहने एक लड़की का फोटो लाया जाता है,
जब भाभी हमें मनाती हैं, फोटो दिखलाया जाता है,
जब सारे घर का समझाना हमको फनकारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।

दीदी कहती हैं उस पगली लडकी की कुछ औकात नहीं,
उसके दिल में भैया तेरे जैसे प्यारे जज़्बात नहीं,
वो पगली लड़की मेरी खातिर नौ दिन भूखी रहती है,
चुप चुप सारे व्रत करती है, मगर मुझसे कुछ ना कहती है,
जो पगली लडकी कहती है, मैं प्यार तुम्ही से करती हूँ,
लेकिन मैं हूँ मजबूर बहुत, अम्मा-बाबा से डरती हूँ,
उस पगली लड़की पर अपना कुछ भी अधिकार नहीं बाबा,
सब कथा-कहानी-किस्से हैं, कुछ भी तो सार नहीं बाबा,
बस उस पगली लडकी के संग जीना फुलवारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।

https://dc.kavyasaanj.com/2024/11/ek-ladaki-pagali-ke-bin- by-kumar-vishwas.html

- कुमार विश्वास





Wednesday, 14 February 2024

इर्दगिर्द

काहे आग लगाए फिरता
अंदर जो बसता है सांई
बांझ नज़र से बीज तू बोए
दुश्मन दुनिया लहु बियाही

धोखे से ही हुआ जो पैदा
और बढ़ा धोखा ही देकर
धोखा सिर पर मुकुट जड़ा तो
अंधा राजा मूढ़ सिपाही

वार करे सो वार मिलेगा
"कुर्सी" को इतवार मिलेगा
देखनवाला चैन से बैठा
तूने ही सब सुनि सुनाई

तेरी चादर तेरी रोटी
मां तेरी हर कोई बेटी
तेरा शक है कर्म की बाधा
तेरी शर्म ही तेरी लुगाई

जितना उलझा उतना भागा
तू धागा तुझे दिखे ना तागा
छिपा के मुंह जो बुनतर बैठा
तुहि उधेड़े तेरी बुनाई

पढ़ लिख कर तू ज्ञान बनेगा
चला जो भीतर ध्यान बनेगा
आप मिटे और जात मिटे तो
कण कण प्रेम का दिए दिखाई

https://dc.kavyasaanj.com/


– जितेंद्र शकुंतला जोशी
(14 Feb 2024)



Monday, 27 February 2023

दुनिया डोक्यावर घेणार हाय रं!

तुझी तुलाच पुरी करायची 
हौस आकाशी उंच उडायची.... (2)

गड्या तयारी ठेव र मनाची 
कधी झुकायची कधी नडायची

दुनिया डोक्यावर घेणार हाय र 
तुला उचलून घेणार हाय र ...(2)

आला जरी कधी कठीण क्षण तो 
खंबीर उभ तु ऱ्हायच ,
गड्या खंबीर उभ तु ऱ्हायच...

हाटायच नाय गड्या झटायचं ,
पुढं पुढं तु चालत जायच...
पुढं पुढं तु चालत जायच...

ताज्या दमाच तरुणाईच
मिळालं रे वरदान... 
तुला  मिळालं रे वरदान...

रेशमी कापड हातात तुझ्या
करू नको बारदान
त्याच करू नको बारदान...

आईबापाच्या पायावर डोक
बाकी जगाशी ऱ्हा रोकठोक

अगदीच नाही अस पण नाही 
साथीला शिल्लक चांगली लोक 

सलामी झुकून
सलामी ठोकून 
सलामी वाकून 
देणार हाय र 
तुला उचलून घेणार हाय र ...

दुनिया डोक्यावर घेणार हाय र ...
तुला उचलून घेणार हाय र ...
https://dc.kavyasaanj.com/2023/02/Tujhi-tulach-puri-karaychi-kavita-lyrics-by-omkar-bhojane.html

- ओंकार भोजने





Wednesday, 1 February 2023

चांदोबा चांदोबा भागलास का

चांदोबा चांदोबा भागलास का ?
निंबोणीच्या झाडामागे लपलास का ?
निंबोणीचे झाड करवंदी,
मामाचा वाडा चिरेबंदी !

आई-बाबांवर रुसलास का ?
कसाच एकटा बसलास का ?
आता तरी परतुनी जाशील का ?
दूध न्‌ शेवया खाशील का ?

आई बिचारी रडत असेल,
बाबांचा पारा चढत असेल !
असाच बसून राहशील का ? 
बाबांची बोलणी खाशील का ?

चांदोबा, चांदोबा कुठे रे गेला ?
दिसता दिसता गडप झाला !
हाकेला 'ओ' माझ्या देशील का ?
पुन्हा कधी आम्हाला दिसशील का ?

https://dc.kavyasaanj.com/2023/01/chandoba-chandoba-bhaglas-ka.html

कवी - ग. दि. माडगूळकर