Friday, 1 May 2026

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे... हम देखेंगे...

हम देखेंगे...

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लोह-ए-अज़ल में लिखा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां
रुई की तरह उड़ जाएँगे
हम महकूमोंके पाँव तले
ये धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएँगे
हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएँगे
सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे

बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उट्ठेगा अन-अल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
और राज़ करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
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रचनाकार: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (यह नज़्म मूल रूप से 1979 में लिखी गई थी)

फिल्म: द कश्मीर फाइल्स (2022) में इस्तेमाल किए गया है
संगीतकार (Music Composer): स्वप्निल बांदोडकर
मुख्य गायक (Singers): फिल्म में  यह एक समूह गीत है, जिसे पल्लवी जोशी, सलमान अली, स्वप्निल बांदोडकर, शहजाद अली, मेघना मिश्रा और अनन्या वाडकर ने मिलकर गाया है

Thursday, 30 April 2026

पड रे पाण्या, पड रे पाण्या, कर पाणी पाणी...

पड रे पाण्या, पड रे पाण्या, कर पाणी पाणी
शेत माझं लई तान्हेलं चातकावाणी.
बघ नांगरलं नांगरलं, कुळवून वज केली,
सुगरणबाई पाभरीला शेतावर नेली...

तापली धरणी, पोळले चरणी मी अनवाणी,
पड रे पाण्या, पड रे पाण्या, कर पाणी पाणी
निढळावर हात ठेवून वाट मी किती पाहू?
खिंडीतोंडी हटवाद्या नको उभा राहू!!

वरड वरड वरडिती, रानी मोरमोरिनीं
पड रे पाण्या, पड रे पाण्या, कर पाणी पाणी
पाण्या पड तू, मिरगाआधी रोहिणीचा,
पाळणा रे लागे भावाआधी बहिनिचा!!

आला वळीव खिंडीतोंडी शिवार झोडीत
जाईच्या ग झाडाखाली धनी पाभर सोडित.
पड रे पाण्या, पड रे पाण्या, भिजवि जमिनी
जेवण घेऊन शेतावरी चालली कामिनी!!!
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कवी: र. वा. दिघे
(गायक: प्रल्हाद शिंदे)

Tuesday, 3 March 2026

बघ उघडूनी दार, अंतरंगातला देव गावंल का !?!?

शोधुन शिणला जीव आता रे
साद तुला ही पोचंल का
दारोदारी हुडकलं भारी
थांग तुझा कधी लागंल का
शाममुरारी, कुंजविहारी
तो शिरीहारी भेटंल का
वाट मला त्या गाभाऱ्याची
आज कुनी तरी दावंल का
बघ उघडुनी दार, अंतरंगातला देव गावंल का ?

तान्ह्या बाळाच्या हासे रं डोळ्यांत तो
नाचे रंगुन संतांच्या मेळ्यात जो
तुझ्या-माझ्यात भेटेल साऱ्यात तो
शोध नाही कुठे या पसाऱ्यात तो
रोज वृंदावनी फोडी जो घागरी
तोच नाथा घरी वाहातो कावडी
गुंतला ना कधी मंदिरी राऊळी
बाप झाला कधी जाहला माउली
भाव भोळा जिथे धावला तो तिथे
भाव नाही तिथे सांग धावंल का
बघ उघडूनी दार, अंतरंगातला देव गावंल का ?

राहतो माउलीच्या जिव्हारात जो
डोलतो मातलेल्या शिवारात तो
जो खुळ्या कोकिळेच्या गळी बोलतो
दाटुनी तोच आभाळी ओथंबतो
नाचवे वीज जो, त्या नभाच्या उरी 
होई काठी कधी आंधळ्याच्या करी
घेवुनी लाट ये जो किनाऱ्यावरी
तोल साऱ्या जगाचाही तो सावरी
राहतो तो मनी , या जनी-जीवनी
एका पाषाणी तो सांग मावंल का
बघ उघडुनी दार, अंतरंगातला देव गावंल का ?



https://dc.kavyasaanj.com/2026/03/bhartiy-bg-ughaduni-daar-antarangatla-dev-ghaval-ka.html

गीतकार : गुरु ठाकूर (चित्रपट : भारतीय (२०१२) )

Monday, 2 February 2026

इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं...

इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं
जिधर देखता हूं, गधे ही गधे हैं

गधे हंस रहे, आदमी रो रहा है
हिन्दोस्तां में ये क्या हो रहा है

जवानी का आलम गधों के लिये है
ये रसिया, ये बालम गधों के लिये है

ये दिल्ली, ये पालम गधों के लिये है
ये संसार सालम गधों के लिये है

पिलाए जा साकी, पिलाए जा डट के
तू विहस्की के मटके पै मटके पै मटके

मैं दुनियां को अब भूलना चाहता हूं
गधों की तरह झूमना चाहता हूं

घोडों को मिलती नहीं घास देखो
गधे खा रहे हैं च्यवनप्राश देखो

यहां आदमी की कहां कब बनी है
ये दुनियां गधों के लिये ही बनी है

जो गलियों में डोले वो कच्चा गधा है
जो कोठे पे बोले वो सच्चा गधा है

जो खेतों में दीखे वो फसली गधा है
जो माइक पे चीखे वो असली गधा है

मैं क्या बक गया हूं, ये क्या कह गया हूं
नशे की पिनक में कहां बह गया हूं

मुझे माफ करना मैं भटका हुआ था
वो ठर्रा था, भीतर जो अटका हुआ था

https://dc.kavyasaanj.com/2026/02/om-prakash-aditya-hasya-kavita-idhar-bhi-gadhe-hain-udhar-bhi-gadhe-hain.html

हास्य कवि - ओम प्रकाश आदित्य
(किताब : यार सप्तक, प्रकाशन : डायमंड पॉकेट बुक्स)