Tuesday, 3 March 2026

बघ उघडूनी दार, अंतरंगातला देव गावंल का !?!?

शोधुन शिणला जीव आता रे
साद तुला ही पोचंल का
दारोदारी हुडकलं भारी
थांग तुझा कधी लागंल का
शाममुरारी, कुंजविहारी
तो शिरीहारी भेटंल का
वाट मला त्या गाभाऱ्याची
आज कुनी तरी दावंल का
बघ उघडुनी दार, अंतरंगातला देव गावंल का ?

तान्ह्या बाळाच्या हासे रं डोळ्यांत तो
नाचे रंगुन संतांच्या मेळ्यात जो
तुझ्या-माझ्यात भेटेल साऱ्यात तो
शोध नाही कुठे या पसाऱ्यात तो
रोज वृंदावनी फोडी जो घागरी
तोच नाथा घरी वाहातो कावडी
गुंतला ना कधी मंदिरी राऊळी
बाप झाला कधी जाहला माउली
भाव भोळा जिथे धावला तो तिथे
भाव नाही तिथे सांग धावंल का
बघ उघडूनी दार, अंतरंगातला देव गावंल का ?

राहतो माउलीच्या जिव्हारात जो
डोलतो मातलेल्या शिवारात तो
जो खुळ्या कोकिळेच्या गळी बोलतो
दाटुनी तोच आभाळी ओथंबतो
नाचवे वीज जो, त्या नभाच्या उरी 
होई काठी कधी आंधळ्याच्या करी
घेवुनी लाट ये जो किनाऱ्यावरी
तोल साऱ्या जगाचाही तो सावरी
राहतो तो मनी , या जनी-जीवनी
एका पाषाणी तो सांग मावंल का
बघ उघडुनी दार, अंतरंगातला देव गावंल का ?



https://dc.kavyasaanj.com/2026/03/bhartiy-bg-ughaduni-daar-antarangatla-dev-ghaval-ka.html

गीतकार : गुरु ठाकूर (चित्रपट : भारतीय (२०१२) )

Monday, 2 February 2026

इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं...

इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं
जिधर देखता हूं, गधे ही गधे हैं

गधे हंस रहे, आदमी रो रहा है
हिन्दोस्तां में ये क्या हो रहा है

जवानी का आलम गधों के लिये है
ये रसिया, ये बालम गधों के लिये है

ये दिल्ली, ये पालम गधों के लिये है
ये संसार सालम गधों के लिये है

पिलाए जा साकी, पिलाए जा डट के
तू विहस्की के मटके पै मटके पै मटके

मैं दुनियां को अब भूलना चाहता हूं
गधों की तरह झूमना चाहता हूं

घोडों को मिलती नहीं घास देखो
गधे खा रहे हैं च्यवनप्राश देखो

यहां आदमी की कहां कब बनी है
ये दुनियां गधों के लिये ही बनी है

जो गलियों में डोले वो कच्चा गधा है
जो कोठे पे बोले वो सच्चा गधा है

जो खेतों में दीखे वो फसली गधा है
जो माइक पे चीखे वो असली गधा है

मैं क्या बक गया हूं, ये क्या कह गया हूं
नशे की पिनक में कहां बह गया हूं

मुझे माफ करना मैं भटका हुआ था
वो ठर्रा था, भीतर जो अटका हुआ था

https://dc.kavyasaanj.com/2026/02/om-prakash-aditya-hasya-kavita-idhar-bhi-gadhe-hain-udhar-bhi-gadhe-hain.html

हास्य कवि - ओम प्रकाश आदित्य
(किताब : यार सप्तक, प्रकाशन : डायमंड पॉकेट बुक्स)

Thursday, 1 January 2026

मुझको अपने बैंक की क़िताब दीजिए

मुझको अपने बैंक की क़िताब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए,

गाँव गाँव ज़ख़्मी फिजाएँ हो गई
ज़हरीली घर की हवाएँ हो गई,
महँगी शराब से दवाएँ हो गई
जाइए आवाम को जवाब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए,

लोग जो ग़रीब थे हक़ीर हो गए
आप तो ग़रीब से अमीर हो गए
यानि हुज़ूर बेज़मीर हो गए
ख़ुद को बेज़मीरी का ख़िताब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए,

जेब है आवाम की सफाई कीजिए
लूट के गरीबो की भलाई कीजिए
कुछ तो निगाहों को हिजाब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए,

कैसी कैसी देखो योजनायें खा गए
बेच कर ये अपनी आत्माएँ खा गए
मार के मरीज़ों की दवाएँ खा गए
इन्हें पद्मश्री का ख़िताब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए..!!
https://dc.kavyasaanj.com/

- मंज़र भोपाली