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Monday, 20 July 2026

मार लो डंडे ... कर लो दमन ...

मार लो डंडे 
कर लो दमन 
मैं फिर फिर लड़ने को पेश हूँ हिदुस्तान कहते है मुझे 
मैं गांधी का देश हूँ !! तुम नफरत नफरत बांटोगे 
मैं प्यार ही प्यार तुम्हे दूंगा 
तुम मारने  हाथ उठाओगे 
मैं बाहों में तुम्हे भर लूंगा 
तुम आवेश की गंगा हो क्या ?
तो सुनो 
मैं शिव शम्भो के केश हूँ हिंदुस्तान  कहते हैं मुझे 
मैं गांधी का देश हूँ जिस सोच को मारने खातिर तुम 
हर एक खुपड़िया खोलोगे 
वो सोच तुम्ही को बदल देगी 
एक दिन शुक्रिया बोलोगे 
मैं कई धर्म 
कई चहरे 
कई रंग रूप 
पहचान लो मुझे 
कई भेष हूँ हिंदुस्तान कहते हैं मुझे 
मैं गांधी का देश हूँ मैं भाषा भाषा में रहता हूँ में धर्म धर्म में बहता हूँ कुछ कहते  हैं मुझे फिक्र नहीं मैं अपनी मस्ती में जीता हूँ मुझ पर एक इलज़ाम भी है 
मैं सोया सोया रहता हूं पर जब जब जागा हूँ सुन लो 
इंक़लाब मैंने लाये 
मेरे आगे कितने ज़ालिम
सब  सारे गये आये 
मैं अड़ जो गया 
हटूंगा नहीं चाहे मार लो डंडे 
उठूँगा नहीं मैं सड़क पे 
बैठी भैंस हूँ हिंदुस्तान कहते हैं मुझे 
मैं गांधी का देश हूँ मैं खुसरो की कव्वाली 
मैं तुलसी की चौपाई 
बुद्ध की मुस्कान हूँ मैं बिस्मिल्लाह की शहनाई 
मैं गिरजे का ऑर्गन हूँ जहां सब मिल जुल कर खेलते हैं मैं वो नानी घर का आँगन हूँ मैं संविधान की किताब हूँ मैं आंबेडकर का न्याय हूँ मैं नफरतो का उपाय हूँ मैं जितना पुराना हूँ हां सुनो 
उससे ज़्यादा शेष हूँ हिन्दुस्तान कहते हैं मुझे 
मैं गांधी का देश हूँ
 
https://dc.kavyasaanj.com/2026/07/maar-lo-dande-kar-lo-daman-by-swanand-kirkire.html

कवी - स्वानंद किरकिरे

Friday, 1 May 2026

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे... हम देखेंगे...

हम देखेंगे...

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लोह-ए-अज़ल में लिखा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां
रुई की तरह उड़ जाएँगे
हम महकूमोंके पाँव तले
ये धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएँगे
हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएँगे
सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे

बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उट्ठेगा अन-अल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
और राज़ करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
https://dc.kavyasaanj.com/

रचनाकार: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (यह नज़्म मूल रूप से 1979 में लिखी गई थी)

फिल्म: द कश्मीर फाइल्स (2022) में इस्तेमाल किए गया है
संगीतकार (Music Composer): स्वप्निल बांदोडकर
मुख्य गायक (Singers): फिल्म में  यह एक समूह गीत है, जिसे पल्लवी जोशी, सलमान अली, स्वप्निल बांदोडकर, शहजाद अली, मेघना मिश्रा और अनन्या वाडकर ने मिलकर गाया है

Monday, 2 February 2026

इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं...

इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं
जिधर देखता हूं, गधे ही गधे हैं

गधे हंस रहे, आदमी रो रहा है
हिन्दोस्तां में ये क्या हो रहा है

जवानी का आलम गधों के लिये है
ये रसिया, ये बालम गधों के लिये है

ये दिल्ली, ये पालम गधों के लिये है
ये संसार सालम गधों के लिये है

पिलाए जा साकी, पिलाए जा डट के
तू विहस्की के मटके पै मटके पै मटके

मैं दुनियां को अब भूलना चाहता हूं
गधों की तरह झूमना चाहता हूं

घोडों को मिलती नहीं घास देखो
गधे खा रहे हैं च्यवनप्राश देखो

यहां आदमी की कहां कब बनी है
ये दुनियां गधों के लिये ही बनी है

जो गलियों में डोले वो कच्चा गधा है
जो कोठे पे बोले वो सच्चा गधा है

जो खेतों में दीखे वो फसली गधा है
जो माइक पे चीखे वो असली गधा है

मैं क्या बक गया हूं, ये क्या कह गया हूं
नशे की पिनक में कहां बह गया हूं

मुझे माफ करना मैं भटका हुआ था
वो ठर्रा था, भीतर जो अटका हुआ था

https://dc.kavyasaanj.com/2026/02/om-prakash-aditya-hasya-kavita-idhar-bhi-gadhe-hain-udhar-bhi-gadhe-hain.html

हास्य कवि - ओम प्रकाश आदित्य
(किताब : यार सप्तक, प्रकाशन : डायमंड पॉकेट बुक्स)

Thursday, 1 January 2026

मुझको अपने बैंक की क़िताब दीजिए

मुझको अपने बैंक की क़िताब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए,

गाँव गाँव ज़ख़्मी फिजाएँ हो गई
ज़हरीली घर की हवाएँ हो गई,
महँगी शराब से दवाएँ हो गई
जाइए आवाम को जवाब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए,

लोग जो ग़रीब थे हक़ीर हो गए
आप तो ग़रीब से अमीर हो गए
यानि हुज़ूर बेज़मीर हो गए
ख़ुद को बेज़मीरी का ख़िताब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए,

जेब है आवाम की सफाई कीजिए
लूट के गरीबो की भलाई कीजिए
कुछ तो निगाहों को हिजाब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए,

कैसी कैसी देखो योजनायें खा गए
बेच कर ये अपनी आत्माएँ खा गए
मार के मरीज़ों की दवाएँ खा गए
इन्हें पद्मश्री का ख़िताब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए..!!
https://dc.kavyasaanj.com/

- मंज़र भोपाली

Monday, 8 December 2025

वरदान माँगूँगा नहीं

यह हार एक विराम है
जीवन महासंग्राम है
तिल-तिल मिटूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं ।
वरदान माँगूँगा नहीं ।।

स्‍मृति सुखद प्रहरों के लिए
अपने खण्डहरों के लिए
यह जान लो मैं विश्‍व की सम्पत्ति चाहूँगा नहीं ।
वरदान माँगूँगा नहीं ।।

क्‍या हार में क्‍या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संघर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही ।
वरदान माँगूँगा नहीं ।।

लघुता न अब मेरी छुओ
तुम हो महान बने रहो
अपने हृदय की वेदना मैं व्‍यर्थ त्‍यागूँगा नहीं ।
वरदान माँगूँगा नहीं ।।

चाहे हृदय को ताप दो
चाहे मुझे अभिशाप दो
कुछ भी करो कर्त्तव्य पथ से किन्तु भागूँगा नहीं ।
वरदान माँगूँगा नहीं ।।


https://dc.kavyasaanj.com/2025/12/vardaan-mangunga-nahi-Shivmangal-Singh-suman.html

कवी : शिवमंगल सिंह ‘सुमन’



Monday, 25 November 2024

एक पगली लड़की के बिन

अमावस की काली रातों में दिल का दरवाजा खुलता है,
जब दर्द की काली रातों में गम आंसू के संग घुलता है,
जब पिछवाड़े के कमरे में हम निपट अकेले होते हैं,
जब घड़ियाँ टिक-टिक चलती हैं,सब सोते हैं, हम रोते हैं,
जब बार-बार दोहराने से सारी यादें चुक जाती हैं,
जब ऊँच-नीच समझाने में माथे की नस दुःख जाती है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।

जब पोथे खाली होते है, जब हर्फ़ सवाली होते हैं,
जब गज़लें रास नही आती, अफ़साने गाली होते हैं,
जब बासी फीकी धूप समेटे दिन जल्दी ढल जता है,
जब सूरज का लश्कर छत से गलियों में देर से जाता है,
जब जल्दी घर जाने की इच्छा मन ही मन घुट जाती है,
जब कालेज से घर लाने वाली पहली बस छुट जाती है,
जब बेमन से खाना खाने पर माँ गुस्सा हो जाती है,
जब लाख मन करने पर भी पारो पढ़ने आ जाती है,
जब अपना हर मनचाहा काम कोई लाचारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।

जब कमरे में सन्नाटे की आवाज़ सुनाई देती है,
जब दर्पण में आंखों के नीचे झाई दिखाई देती है,
जब बड़की भाभी कहती हैं, कुछ सेहत का भी ध्यान करो,
क्या लिखते हो दिन भर, कुछ सपनों का भी सम्मान करो,
जब बाबा वाली बैठक में कुछ रिश्ते वाले आते हैं,
जब बाबा हमें बुलाते है,हम जाते में घबराते हैं,
जब साड़ी पहने एक लड़की का फोटो लाया जाता है,
जब भाभी हमें मनाती हैं, फोटो दिखलाया जाता है,
जब सारे घर का समझाना हमको फनकारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।

दीदी कहती हैं उस पगली लडकी की कुछ औकात नहीं,
उसके दिल में भैया तेरे जैसे प्यारे जज़्बात नहीं,
वो पगली लड़की मेरी खातिर नौ दिन भूखी रहती है,
चुप चुप सारे व्रत करती है, मगर मुझसे कुछ ना कहती है,
जो पगली लडकी कहती है, मैं प्यार तुम्ही से करती हूँ,
लेकिन मैं हूँ मजबूर बहुत, अम्मा-बाबा से डरती हूँ,
उस पगली लड़की पर अपना कुछ भी अधिकार नहीं बाबा,
सब कथा-कहानी-किस्से हैं, कुछ भी तो सार नहीं बाबा,
बस उस पगली लडकी के संग जीना फुलवारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।

https://dc.kavyasaanj.com/2024/11/ek-ladaki-pagali-ke-bin- by-kumar-vishwas.html

- कुमार विश्वास





Wednesday, 14 February 2024

इर्दगिर्द

काहे आग लगाए फिरता
अंदर जो बसता है सांई
बांझ नज़र से बीज तू बोए
दुश्मन दुनिया लहु बियाही

धोखे से ही हुआ जो पैदा
और बढ़ा धोखा ही देकर
धोखा सिर पर मुकुट जड़ा तो
अंधा राजा मूढ़ सिपाही

वार करे सो वार मिलेगा
"कुर्सी" को इतवार मिलेगा
देखनवाला चैन से बैठा
तूने ही सब सुनि सुनाई

तेरी चादर तेरी रोटी
मां तेरी हर कोई बेटी
तेरा शक है कर्म की बाधा
तेरी शर्म ही तेरी लुगाई

जितना उलझा उतना भागा
तू धागा तुझे दिखे ना तागा
छिपा के मुंह जो बुनतर बैठा
तुहि उधेड़े तेरी बुनाई

पढ़ लिख कर तू ज्ञान बनेगा
चला जो भीतर ध्यान बनेगा
आप मिटे और जात मिटे तो
कण कण प्रेम का दिए दिखाई

https://dc.kavyasaanj.com/


– जितेंद्र शकुंतला जोशी
(14 Feb 2024)