Monday, 29 April 2019

सुना है लोग

सुना है लोग हारने के बाद
हमेशा अपने नसीब को कोसते है।
लेकिन जीतनेवाले कभी नसीब को
श्रेय क्यों नही देते!?!

सुना है लोग सोशल मीडिया पे
बोहत खुश दिखते है।
लेकिन असल जिंदगी में
ऐसा क्यों नहीं लगते!?!

सुना है लोग आज बोहोत
ज़्यादा जागृत हो गए हैं।
लेकिन मतदान करनेवालों के आंकड़े
(यह) बयां क्यों नहीं करते!?!

- धनंजय चौधरी




Thursday, 28 March 2019

दिल तो चाहता है..

दिल तो चाहता है...
बचपन फ़िर एक बार मिल जाए
किन्तु… डर लगता है कि
गणित की परिक्षा फ़िर न आजाए!?!

दिल तो चाहता है…
आसमान में खुले पंख उड़ा जाए
किन्तु... डर लगता है कि
बारिश की बुँदे देख नाच न कर पाए!?!

दिल तो चाहता है…
लॉटरी कोई एक बार लग जाए
किन्तु.. डर लगता है कि
मेहनत की कमाई फ़िर कभी न हँसाए!?!

दिल तो चाहता है…
बड़ी कोई कार खरीद ली जाए
किन्तु... डर लगता है कि
पार्किंग की कमी से कही चोरी न होजाए!?!

दिल तो चाहता है...
हमे भी कोई दिल से चाहे
किन्तु… डर लगता है कि
दिल की चाहत फ़िर दिल को न रुलाए!?!

- धनंजय चौधरी




Sunday, 3 March 2019

दुष्काळी प्रेम

शेतकऱ्याच्या ओठांत हुंदके
डोळ्यात आस पावसाची 
दुष्काळात फुलेल का प्रेम 
येऊन झुळूक धुंद वाऱ्याची !?!


- धनंजय चौधरी





Thursday, 28 February 2019

समजूतदारपण

स्वतःची
समजूत
घालता
घालता
समजूतदारपण
मनात
घट्ट
रुतून
बसतं.
आतल्या
पोकळिशी
जुळवून
घेत
त्याचा
पिंड
मजबूत
होतो.
समुजतदारपण
पुसून
टाकतं
तक्रारीचा
अवखळ
आलेख.
आणि
निस्तब्ध
हृदयाची
समांतर
समांतर
होत
जाते
रेघ.
समजूतदारपण निवृत्तीची रंगीत तालीमय.
समजूतदारपण वरून संथ, आतून जालीमय.


कवयित्री - योजना यादव